Thursday, November 5, 2009

भेड़िए और मेमने की यारीः राम पुनियानी -love-ishq-jihad

संघ परिवार का एक पुराना पसंदीदा नारा था, “पहले कसाई, फिर ईसाई“। और सचमुच, संघ परिवार ने इसी क्रम में अपना हमला किया। पहले उसके निशाने पर सिर्फ मुसलमान थे। फिर, सन् 1990 के दशक से उसने ईसाईयों को भी अपनी हिंसा का निशाना बनाना शुरू कर दिया।

केरल में संघ परिवार ने एक कमाल कर दिखाया है। उसने “केरल विश्पस् काउंसिल“ के साथ “लव-जेहाद“ (इश्क-जेहाद) से लड़ने के लिए संयुक्त मोर्चा बनाया है। “इश्क-जेहाद“ शब्द को गढ़ा भी संघ परिवार ने ही है। यह दो सुंदर शब्दों को जोड़कर बनाया गया एक डरावना नया शब्द है। इसका इस्तेमाल, प्रेमियों को यंत्रणा देने के लिए किया जावेगा-उन प्रेमी युगलों को जिनमें लड़का मुसलमान है और लड़की गैर-मुसलमान। यह मुसलमानों के खिलाफ भगवा ब्रिगेड के युद्ध का नया मोर्चा है।

समाज का साम्प्रदायिकीकरण किस हद तक हो चुका है, इसका एक सुबूत यह है कि “इश्क-जेहाद“ को न केवल समाज के एक हिस्से वरन् हाईकोर्ट द्वारा भी गंभीरतापूर्वक लिया जा रहा है। सिलाजराज विरूद्ध असगर मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मामले के तथ्यों का “राष्ट्रीय महत्व है....... और ये राष्ट्रीय सुरक्षा व महिलाओं के गैर-कानूनी व्यापार की दृष्टियों से भी महत्वपूर्ण है“। और इसलिए, हाईकोर्ट ने कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक को “इश्क-जेहाद“ की गहराई से जांच करने का आदेश दिया। जांच पूरी होने तक लड़की को उसके मां-बाप के साथ रहने का आदेश भी दिया गया। न्यायालय का यह आदेश गैर-कानूनी तो है ही, वह यह भी दर्शाता है कि हाईकोर्ट जज तक समाज में फैली भ्रांतियों और दुष्प्रचार से कितने प्रभावित हो गए हैं। क्या कोई अदालत किसी वयस्क विवाहित लड़की को उसके पति से केवल इसलिए अलग करने का आदेश दे सकती है क्योंकि लड़की के माता-पिता उसके पति के चुनाव से असहमत हैं? वह भी तब, जब पति वयस्क हो और भारत का नागरिक हो।

इसी तरह के एक अन्य मामले में, कुछ समय पहले, केरल उच्च न्यायालय ने दो अभिभावकों की अपील पर ऐसा ही निर्णय दिया था। दो हिन्दू लड़कियां अपने घरों से भागकर मुसलमान बन गईं थीं और मुस्लिम लड़कों से विवाह करने वाली थीं। अदालत ने कहा कि “इन लड़कियों की मुसलमानों से शादी एक सुनियोजित योजना के तहत हो रही प्रतीत होती है और इसका संबंध, हिन्दू महिलाओं के व्यापार से है“। केरल हाईकोर्ट ने भी पुलिस को इस कोण से पूरे मामले की जांच करने को कहा। पुलिस जांच से यह सामने आया कि “इश्क-जेहाद“ जैसी कोई चीज नहीं है।
कर्नाटक हाईकोर्ट के विवाहित लड़की को उसके मां-बाप के पास भेजने से रूष्ट, पी. यू. सी. एल. की राज्य इकाई, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की योजना बना रही है।

इस दुष्प्रचार की शुरूआत श्रीराम सेने ने की। पूरी कहानी इस प्रकार थी- यह कहा गया था कि लगभग 4000 हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बना लिया गया है। मुस्लिम लडकों को हिन्दू व ईसाई लड़कियों को फंसाने के लिए धन दिया जाता है। हर लड़के को एक लाख रूपये मिलते हैं, जिससे उसे एक मोटरसाईकिल, मोबाइल, फैशनेबिल कपड़े, जूते आदि खरीदने होते हैं। इसके बदले उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे कम से कम एक गैर-मुस्लिम लड़की से प्रेम का नाटक करेंगे, उसको भगाकर ले जाएंगे ओर फिर उसे मुसलमान बनाकर उससे शादी कर लेंगे। शर्तों में यह भी शामिल रहता है कि वो उस लड़की से कम से कम चार संतानों को जन्म देंगे।

यह हास्यास्पद, कपोल-कल्पित कहानी जंगल की आग की तरह कर्नाटक में फैल गई और युवा लड़कियों के अभिभावक बहुत डर गए। श्रीराम सेने के कार्यकर्ता ऐसे नव-युगलों के अभिभावकों की अदालत जाने में मदद करते हैं। ऐसे ही एक मामले में अदालत ने लड़की को मां-बाप को सौंपने का आदेश दिया था। कई लड़कियां, जो सचमुच मुस्लिम लड़कों से प्यार करती थीं और जिन्होंने अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन किया था, वे भी अपने मां-बाप के साथ रहने के बाद बदल गईं। अभिभावकों के “भावनात्मक ब्लेकमेल“ के आगे लड़कियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और वे यह तक कहने लगीं कि उन पर मानसिक दबाव डाला गया था, उन्हें जेहादी सी. डी. दिखाई गईं थीं आदि-आदि।

गुजरात में भी यह अफवाह फैलाई गई थी कि मुस्लिम लड़के, आदिवासी लड़कियों को अपने जाल में फंसा रहे हैं। बाबू बजरंगी, जिसने गुजरात दंगों में जमकर खून-खराबा किया था, ने गुंडों का एक दल तैयार किया। ये गुंडा-गैंग प्रेमी युगलों पर हमला करता थी और उन युगलों को अलग-अलग कर देती थी जिनमें प्रेमी व प्रेमिका अलग-अलग धर्मों से होते थे। और यह सारी गुंडागर्दी धर्म रक्षा के नाम पर की जाती थी! हमारे सामने रिज़वान उर रहमान और प्रभावशाली कुबेरपति की लड़की प्रिंयका तुली का मामला है जिसमें प्रियंका ने अभिभावकों और रिश्तेदारों के भावनात्मक ब्लेकमेल के आगे घुटने टेक दिए थे। बाद में परेशानहाल रिज़वान ने आत्महत्या कर ली थी। ऐसे सभी मामलों में पुलिस और राज्य तंत्र का दृष्टिकोण कानून के प्रावधानों और उसकी आत्मा के खिलाफ रहता है। कानून के रक्षक उन लोगों का साथ देते हैं जो कानून की धज्जियां उड़ाते हैं।

अंतर्धार्मिक व अंतर्जातीय विवाहों के खिलाफ इस तरह के अभियान न केवल राष्ट्रीय एकीकरण को बाधित करते हैं वरन् पितृसत्तातमक व्यवस्था के अनुरूप महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करने का प्रयत्न भी करते हैं। इस तरह के अभियान का एक अतिरिक्त लाभ यह होता है कि अल्पसंख्यकों का नया हौआ खड़ा हो जाता है जो कि संघ परिवार के समाज को बांटने के प्रयास में मदद करता है। इस तरह, संघ परिवार एक तीर से दो निशाने साध रहा है। संघ परिवार का उद्देश्य है मुसलमानों को कुचलना और समाज पर पितृसत्तातमक मूल्य लादना। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस काम में उनकी मदद एक दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय कर रहा है-वह समुदाय जो स्वयं भी संघ परिवार के अत्याचारों का शिकार रहा है।

यह अत्यंत दुःखद है कि हमारी अदालतें, सगोत्र विवाह करने वालों को प्रताड़ित करने वाली “खाप पंचायतों'' और राम सेनाओं व बाबू बजरंगियों पर शिकंजा कसने की बजाए, उन लड़कियों के जीवन में अकारण हस्तक्षेप कर रही हैं, जो वयस्क हैं और अपनी मर्जी से दूसरे धर्म के युवक के साथ विवाह करना चाहती हैं। इससे समाज में मुस्लिम-विरोधी भावनाएं और भड़केंगी और इसके खतरनाक नतीजे हो सकते हैं।

हम सबको यह ज्ञात है कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान, विभिन्न धार्मिक समुदाय एक-दूसरे के नजदीक आए और अंतर्धार्मिक व अंतर्जातीय विवाह होने शुरू हुए। ये विवाह भारतीय राष्ट्रीयता को मजबूती देते हैं।
धर्म-आधारित राष्ट्रवाद के पैरोकारों ने एक नया, कपोल-कल्पित मुद्दा गढ़कर अपनी धर्मनिरपेक्षता-विरोधी मानसिकता का एक बार फिर परिचय दिया है।

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लेख 'अवामे हिन्‍द' 5 नवम्‍बर 2009 प्रकाशित, आनलाइन पढने के लिये देखें www.awamehind.com
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)