केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्री ,शरद पवार ने एक बार फिर वह काम किया है जिसके लिए उन्हें गरीब आदमी कभी माफ़ नहीं करेगा.एक बार फिर उन्होंने सरकार के संभावित फैसले को लीक कर के महंगाई के नीचे पिस रही जनता को भूख से मरने वालों की अगली कतार में झोंक दिया है .उन्होंने एक बयान दे दिया है कि आने वाले कुछ दिनों में दूध की कीमतें भी बढ़ने वाली हैं ... उनके इस बयान का असर यह हुआ है कि अभी सरकार तो पता नहीं कब दूध की कीमतें बढायेगी, लेकिन आज सुबह से ही दूध वालों ने निरीह मिडिल क्लास के लोगों से दूध की ज्यादा कीमतें वसूलना शुरू कर दिया है ...अभी कुछ हफ्ते पहले उन्होंने चीनी की कीमतें बढ़ने की चेतावनी दे कर चीनी के जमाखोरों को आगाह कर दिया था कि चीनी की मूल्यवृद्धि के बहाने आम आदमी की जेब पर हमला बोलने का वक़्त आ गया है ..जमाखोरों और मुनाफाखोरों ने उनकी उस सूचना का फायदा भी उठाया और चीनी की कीमतें आसमान तक पंहुच गयी.चीनी के जमाखोरों को फायदा पंहुचाने की बात समझ में आती है क्योंकि शरद पवार को आम तौर पर शुगर लॉबी का एजेंट माना जाता है और वे खुद भी कई चीनी मिलों में हिस्सेदार हैं . इस देश में इस बात का इतिहास रहा है कि शुगर लॉबी वाले और चीन मिल मालिक सरकार में शामिल अपने बन्दों की मदद से मुनाफाखोरी करते रहे हैं . शरद पवार तो पहले से ही शुगर लॉबी के आदमी माने जाते हैं. इसलिए जब उन्होंने चीनी की कीमतों को बढाने की चीनी मिल मालिकों और जमाखोरों की साज़िश में सरगना के रूप में हिस्सा लेना शुरू किया तो लोगों को लगा कि एक भ्रष्ट मंत्री को जो करना चाहिए, कर रहा है . जनता चीनी की बढ़ती कीमतों का तमाशा देखती रही और त्राहि त्राहि करती रही. दुनिया जानती है कि चीनी की कीमत बढ़ने से बहुत सारी चीज़ों की कीमतें अपने आप बढ़ जाती हैं . शरद पवार को कोई फर्क नहीं पड़ा. वे नीरो की तरह अपने काम में लगे रहे . जिस तरह जब रोम में आग लगी थी तो नीरो बांसुरी बजा रहा था उसी तरह जब चौतरफा राजनीतिक दबाव के बाद बुरी तरह घिर चुकी सरकार ने कुछ करने की कोशिश की तो सरकारी सख्ती को बिलकुल बेकार करने की गरज से शरद पवार ने कहा कि मैं ज्योतिषी नहीं हूँ जो चीनी की कीमतों को कम करने के बारे में कोई तारीख बता सकूं. इसका सीधा मतलब यह था कि शरद पवार ने चीनी के जमाखोरों को आश्वस्त कर दिया था कि घबड़ाओ मत अभी कुछ नहीं होने वाला है . लूटमार बदस्तूर जारी रही और जब केंद्र सरकार ने लोकलाज से बचने के लिए खाद्यमंत्री को टाईट किया तो उन्होंने फरमाया कि अभी चीनी की कीमतें कम होने में दस दिन लगेंगें . इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने साफ़ भरोसा दे दिया चीनी के जमाखोरों और मुनाफाखोरों को कि अभी दस दिन तक का समय है अपना सारा हिसाब किताब दुरुस्त कर लो.. स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक से एक भ्रष्ट और गैर ज़िम्मेदार मंत्री हुए है लेकिन लगता है कि शरद पवार उस लिस्ट में सबसे ऊपर पाए जायेंगें .. . शरद पवार को एक और काम में भी महारत हासिल है .अपनी शातिराना साजिशों के असर का ज़िम्मा किसी और के ऊपर मढ़ देने में भी उनका जवाब नहीं है .. जब पिछले दिनों चौतरफा महंगाई के लिए उनसे मीडिया ने सवाल किया तो उन्होंने कहा कि राशन की दुकानों और गरीबी के रेखा के नीचे के लोगों का काम राज्य सरकारों के जिम्मे है और राज्य सरकारें अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहीहैं इसलिए महंगाई पर काबू पाने में दिक्क़त हो रही है . . चीनी की कीमतें बढाने के साज़िश में शरद पवार के शामिल होने की बात में आम तौर किसी शक की गुंजाइश नहीं है . लेकिन केंद्रीय सरकार में विभिन्न व्यापारिक हितों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की वजह से भी खाने पीने की चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं . महंगाई का एक बड़ा कारण यह भी है कि अनाज के वायदा कारोबार का काम भी शुरू हो गया है . यानी जमाखोरों को इस बात की छूट है कि वे जितना चाहें ,उतना अनाज जमा कर के कीमतें बढ़ने पर बेचें ..इसकी वजह से बहुत बड़े पैमाने पर आनाज जमाखोरों के गोदामों में जमा है . हालांकि यह बात अखबारों में ठीक से प्रचारित नहीं की गयी है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि अमरीका की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की कंपनी कारगिल भी पिछले कुछ वर्षों से देश में बहुत बड़े पैमाने पर अनाज की खरीद कर रही है . उसने जिलों में अपने कर्मचारी तैनात कर रखे हैं जो एफ सी आई से ज्यादा कीमत पर गेहूं और धान की खरीद कर रहे हैं . इस खरीद का सारा हिस्सा सीधे वायदा कारोबार के हवाले हो जाता है . इसका एक तोला भी राशन की दुकानों या सार्वजनिक वितरण की प्रणाली में नहीं जाता . ज़ाहिर है इसकी वजह से कृत्रिम कमी के हालात बन रहे हैं ...यही हाल चीनी का भी है .. सवाल उठता है कि कारगिल को तो शरद पवार ने देश में अनाज खरीदने की अनुमति नहीं दी . , उसके लिए तो अमरीका परस्ती की केंद्र सरकार की नीतियाँ ही ज़िम्मेदार मानी जायेंगीं. .पता लगाने की ज़रुरत है किअपने देश में इस तरह से खुले आम खरीद करने की अनुमति कारगिल जैसी कंपनी को किसने दी है . कारगिल की भयावहता के बारे में अभी भारत में जानकारी का अभाव है. यह वही कंपनी है जिसने लातिन अमरीका के कई देशों में खाने पीने की चीज़ों की कृत्रिम कमी का माहौल बनाया और वहां खाद्य दंगें तक करवाए. कारगिल अफ्रीका के कई देशों में सरकारे गिराने का काम भी कर चुका है .. . दुनिया में कई देशों की सरकारें कारगिल की नाराज़गी झेल चुकी हैं और उन्हें अपदस्थ भी होना पड़ा है ..अमरीकी प्रशासन में भी इस कंपनी की तूती बोलती है .. इस बात की जांच करना दिलचस्प होगा कि किस राजनेता ने कारगिल को देश में काम करने की अनुमति दी है . खाद्य सामग्री की कमी का ज़िम्मा उस व्यक्ति पर भी डालना पडेगा. ..
केंद्र सरकार में बैठे लोगों को यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि आम आदमी की पंहुच से खाने पीने की चीज़ों को हटा कर , संविधान के उस मूल अधिकार का भी उन्ल्लंघन हो रहा है जिसके तहत संविधान से सभी नागरिकों को राईट तो फ़ूड का प्रावधान किया है .. जो सरकार दो जून की रोटी के लिए भी आम आदमी को तरसाने की फ़िराक़ में है उसे सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है .... ऐसा नहीं है कि नागरिकों के सामने से रोटी का निवाला छीनने के लिए केवल शरद पवार की ज़िम्मेदार हैं . मौजूदा केंद्र सरकार में और भी ऐसे सूरमा मंत्री हैं जो जनता के पेट पर लात मार कर अपनी पूंजीपति आकाओं को खुश करने के लिए तड़प रहे हैं ... अभी पिछले हफ्ते एक श्रीमान जी को जनता के गुस्से से घबडाई केंद्र सरकार ने रोका वरना वे तो डीज़ल और पेट्रोल की कीमतें भी बढाने जा रहे थे . सबको मालूम है कि पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ने से चौतरफा महंगाई आती है ..लेकिन आज पूंजीपतियों के हुक्म की गुलाम सरकार से कोई उम्मीद करना बिलकुल ठीक नहीं है . हाँ यह उम्मीद की जा सकती है कि मौजूदा सरकार अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ही सही , अनाज, चीनी और पेट्रोल की कीमतों के ज़रिये आम आदमी को लूटने के लिए बैठे पूंजी पतियों को थोडा बहुत काबू में करेगी क्योंकि अगर ऐसा न हुआ और जनता सडकों पर आ गयी तो तब तो ताज भी उछलेंगें और तख़्त भी उछाले जायेंगें ...
Saturday, January 23, 2010
Monday, January 4, 2010
सांस्कृतिक हस्तक्षेप भी तय करता है राजनीति की दिशा
शेष नारायण सिंह # २१ साल पहले सफ़दर हाशमी को दिल्ली के पास एक औद्योगिक इलाके में मार डाला गया था .वे मार्क्सवादी कमुनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता थे . उनको मारने वाला एक मुकामी गुंडा था और किसी लोकल चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार था. अपनी मौत के समय सफ़दर एक नाटक प्रस्तुत कर रहे थे . सफ़दर हाशमी ने अपनी मौत के कुछ साल पहले से राजनीतिक लामबंदी के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप की तरकीब पर काम करना शुरू किया था. कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले बहुत सारे बड़े लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे वे. सफ़दर की मौत के बाद दिल्ली और फिर पूरे देश में ग़म और गुस्से की एक लहर फूट पड़ी थी . जो काम सफ़दर करना चाहते थे और उन्हें कई साल लगते, वह एकाएक उनकी मौत के बाद स्वतः स्फूर्त तरीके से बहुत जल्दी हो गया. देश के हर हिस्से में संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले लोग इकठ्ठा होते गए और सफ़दर की याद में बना संगठन, सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट ,'सहमत' एक ऐसे मंच के रूप में विकसित हो गया जिसके झंडे के नीचे खड़े हो कर हिन्दू पुनरुत्थानवाद को संस्कृति का नाम दे कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने वाले आर एस एस के मातहत संगठनों को चुनौती देने के लिए सारे देश के प्रगतिशील संस्कृति कर्मी लामबंद हो गए.
राजनीतिक उद्देश्यों के लिए संस्कृति के आधार पर जनता को लामबंद करने की पश्चिमी देशो में तो बहुत पहले से कोशिश होती रही है लेकिन अपने यहाँ ऐसी कोई परंपरा नहीं थी .१८५७ में अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ जो एकता दिखी थी , उस से ब्रितानी साम्राज्यवाद की चिंताएं बढ़ गयी थी, भारत का हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर जिस तरह से खड़ा हो गया था , वह भारत में साम्राज्यवादी शासन के अंत की चेतावनी थी . हिन्दू और मुसलमान की एकता को ख़त्म करने के लिए अंग्रेजों ने बहुत सारे तरीके अपनाए . बंगाल का बंटवारा उसमें से एक था. लेकिन जब अंग्रेजों के खिलाफ १९२० में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हिन्दू और मुसलमान फिर लामबंद हो गए तो अंग्रेजों ने इस एकता को खत्म करने केलिए सक्रिय हस्तक्षेप की योजना पर काम करना शुरू कर दिया..१९२० के आन्दोलन के बाद साम्राज्यवादी ब्रिटेन को भारत की अवाम की ताक़त से दहशत पैदा होने लगी थी .सने भारत में सांस्कृतिक हस्तक्षेप के लिए सक्रिय कोशिश शुरू कर दी. अंग्रेजों के वफादारों की फौज में ताज़े ताज़े भर्ती हुए पूर्व क्रांतिकारी ,वी डी सावरकर ने १९२३-२४ में अपनी किताब "हिन्दुत्व-हू इज ए हिन्दू " लिखी जिसे आगे चल कर आम आदमी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भोथरा करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला था .इसी दौर में आर एस एस की स्थापना हुई जिसके सबसे मह्त्वपूर्ण उद्देश्यों में पिछले हज़ार साल की गुलामी से लड़ना बताया गया था . इसका मतलब यह हुआ कि गाँधी जी के नेतृत्व में जो पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ लामबंद हो रहा था, उसका ध्यान बँटा कर उसे मुसलमानों की सत्ता के खिलाफ तैयार करना था . ज़ाहिर है इस से अँगरेज़ को बहुत फायदा होता क्योंकि उसके खिलाफ खिंची हुई भारत के अवाम की तलवारें अंग्रेजों से पहले आये मुस्लिम शासकों को तलाशने लगतीं और अँगरेज़ मौज से अपना राजकाज चलाता रहता . सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सिद्धांत सावरकर की इसी किताब के गर्भ से निकलता हैं. आर एस एस और सावरकर की हिन्दू महासभा के ज़रिये, अवाम को बांटने की अँगरेज़ की इस कोशिश से महात्मा गाँधी अनभिज्ञ नहीं थे . शायद इसी लिए उन्होंने अपने आन्दोलन में सामाजिक परिवर्तन की बातें भी जोड़ दीं. लेकिन दंगों की राजनीति का इस्तेमाल करके हिन्दू और मुसलमानों की एकता को खंडित करने में ब्रितानी साम्राज्य को सफलता मिली . १९२७ में आर एस एस ने नागपुर में जो दंगा आयोजित किया, बाद में बाकी देश में भी उसी माडल को दोहराया गया . नतीजा यह हुआ कि भारत के आम आदमी की एकता को अंग्रेजों ने अपने मित्रों के सहयोग से खंडित कर दिया .
वामपंथी राजनीतिक सोच के लोगों ने संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए पहली बार १९३६ में कोशिश की . प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ और उसके पहले अध्यक्ष ,हिन्दी और उर्दू के बड़े लेखक , प्रेमचंद को बनाया गया.इसी दौर में रंगकर्मी भी सक्रिय हुए और नाटक के क्षेत्र में वामपंथी सोच के बुद्धिजीवियों का हस्तक्षेप हुआ. इप्टा का गठन करके इन लोगों ने बहुत काम किया . लेकिन यह जागरूकता १९४७ में कमज़ोर पड़ गयी क्योंकि कांग्रेस के नेतृत्व में जो आज़ादी मिली थी उसकी वजह से आम आदमी की सोच प्रभावित हुई. वैसे भी राष्ट्रीय चेतना के निगहबान के रूप में कांग्रेस का उदय हो चुका था.. जनचेतना में एक मुकम्मल बदलाव आ चुका था लेकिन वामपंथी उसे समझ नहीं पाए और इसमें बिखराव हुआ.उधर गाँधी हत्या केस में फंस जाने की वजह से आर एस एस वाले भी ढीले पड़ गए थे . १९६४ में विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना करके संघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिन्दू पुनरुत्थानवाद की राजनीति के स्पेस में काम करना शुरू कर दिया. लेकिन उनके पास कोई आइडियाज नहीं थे इसलिये खीच खांच कर काम चलता रहा . वह तो १९८४ के चुनावों में बी जे पी की हार के बाद आर एस एस ने भगवान् राम के नाम पर हिंदुत्व की राजनीति को सांस्कृतिक आन्दोलन का मुखौटा पहना कर आगे करने का फैसला किया . भगवान् राम का हिन्दू समाज में बहुत सम्मान है और उसी के बल पर आर एस एस ने बी जे पी को राजनीति में सम्मानित मुकाम दिलाने की कोशिश शुरू कर दी. सफ़दर हाशमी और उनकी पार्टी को संघ की इस डिजाइन का शायद अंदाज़ लग गया था. लगभग उसी दौर में सफ़दर ने कलाकारों को लामबंद करने की कोशिश शुरू कर दी. सफ़दर की मौत ऐसे वक़्त पर हुई जब आर एस एस ने राम के नाम पर हिन्दू जनमानस के एक बड़े हिस्से को अपने चंगुल में कर रखा था . समझदारी की बात कोई सुनने को तैयार नहीं था लेकिन सहमत के गठन के बाद संस्कृति के स्पेस में संघ को बाकायदा चुनौती दी जाने लगी . सहमत की उस दौर की करता धर्ता , सफदर की छोटी बहन शबनम हाशमी थीं . जिन्होंने अयोध्या के मोर्चे पर ही, विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को चुनती दी और उनकी बढ़त को रोकने में काफी हद तक सफलता पायी. शायद सहमत के नेतृत्व में हुए आन्दोलन का ही नतीजा है कि आज आर एस एस के सभी संगठन बी जे पी के मातहत संगठन बन चुके हैं और सरकार बनाने के चक्कर में हरदम रहते हैं . वहीं से ज़्यादातर संगठनों का खर्चा पानी चलता है ...
सहमत आज सांस्कृतिक हस्तक्षेप के एक ऐसे माध्यम के रूप में स्थापित हो चुका है कि दक्षिणपंथी राजनीतिक और संस्कृति संगठन उसकी परछाईं बचा कर भाग लेते हैं ..उसका कारण शायद यह है कि सहमत के गठन के पहले बहुमत के अधिनायकत्व की सोच की बिना पर चल रहे आर एस एस के धौंस पट्टी के अभियान से लोग ऊब चुके थे और जो भी सहमत ने कहा उसे दक्षिणपंथी दादागीरी से मुक्ति के रूप में अपनाने को उत्सुक थे .सहमत के वार्षिक कार्यक्रमों में ही , ऐतिहासिक रूप से फासीवाद की पक्षधर रही शास्त्रीय संगीत की परम्परा को अवामी प्रतिरोध का हाथियार बनाया गया और उसे गंगा-जमुनी साझा विरासत की पहचान के रूप में पेश किया गया.. सहमत के गठन का यह फायदा हुआ कि कलाकारों को एक मंच मिला . बाद में जब गुजरात में मुसलमानों के सफाए के लिए नरेंद्र मोदी ने अभियान चलाया तो सबसे बड़ा प्रतिरोध उन्हें' सहमत' और शबनम हाशमी के नए संगठन 'अनहद' से ही मिला. आज भी इन्हीं दो संगठनों के बैनर के नीचे मोदी की ज्यादतियों को सिविल सोसाइटी की ओर से चुनौती दी जा रही है. आर एस एस में भी अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रास्ते सत्ता पाने की उम्मीद धूमिल हो गयी है . शायद इसीलिए अब वे नौकरशाही और पुलिस में घुस चुके अपने स्वयंसेवकों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं ..जहां तक संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय प्रगतिशील जमातों की बात है , उनके लिए सहमत और अनहद के अलावा भी बहुत सारे मंच उपलब्ध हैं और हर जगह काम हो रहा है.. राजनीतिक एकजुटता के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप को एक माध्यम बनाने की परंपरा भी रही है और संभावना भी है लेकिन बुनियादी बात आइडियाज़ की है जो दक्षिण पंथी संगठनों के पास बहुत कम होती है जबकि जन आन्दोलन के लिए संस्कृति के औज़ार ही सबसे बड़े हथियार होते हैं . उम्मीद की जानी चाहिए कि जब भी जन आन्दोलनों की बात होगी आम आदमी के साथ खडी जमातों को ज़्यादा सम्मान मिलेगा
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